इन पहाड़ो के पीछे जाने का मन करता है,
बादल वहीं से आते हैं, उनसे मिलने का
मन करता है,
बादल गगन को छु नहीं पाया, उससे मिलने
का मन करता है,
दशा अपनी उससे मिलती जुलती है,यह कहने को मन कर्ता है,
मौसम उसके ही बीच रहता है,
मेरा मौसम गाँव में, बस्ने का मन करता है,
वादियो की हर बहारें बादलों से हैं,
अपनी आशाए उन्हीं जैसी
है,
हर नदी इनके बीच बनती,बस्ती,इठलाती और बड़ी होती है,
यही वो वादी है जिसमें चल कर नदी सागर से मिलती है,
नदी का यौवन और समापन इनसे है,
इनके पास केवल देने को ही है,
हर खुशी इनके दामन से
छलकती है,
इनसे कुछ सीखने का मन करता है,
पहाड़ों तुम्हारे साथ जीने का मन करता है,
इन पहाड़ो के पीछे जाने का मन करता
है,

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