वाह रे जमाने का रिवाज ,
दुहाई किसकी दे यारों ,शहर अपना पराया हुआ है,
भूली हुई यादें
हैं जमाने का खोया हुआ सपना है,
पराये तो पराये होते हैं अपनों ने हमको भुलाया है,
जिधर देखते हैं गम ही गम सभी अपने पराए हुये हैं,
कभी हम भी जिनकी नजर की रौनक हुआ करते थे,
हमारे लिए भी धीरे धीरे खिड़कियाँ खुला करती थी,
हम भी सर को झुकाये कनखियों से उनको देखते थे,
जमाने ने हमारा सबकुछ बेमुरौवती से छीन किया है,
बहारों से उनकी इठलाती अंगड़ाती हवाएँ छीनी गई है,
शिकवे नही है
न शिकायत का गिला है किसी से,
आपनो ने ही हमे दिल से लगाना-अपनाना छोड़ दिया,
ये दिल दरवेशो का कोई अपना और पराया नही होता.