मेरा मन भी पागल हैं
मेरा मन मयूर क्यो बहका बहका फिरता है,
मेरा मन भी पागल हैं चलता फिरता रहता है,
कभी गगन तो कभी धारा पर मतवाला सा चलता है,
अपने ही धुन में गाता रहता गीत प्यार के,
सपने इसके बडे बड़े पर पंख मिले इसको है छोटे छोटे
,
हवा चली जब तेज,पंख हो गए मन मयूर के छोटे छोटे,
गगन कोई भी नाप न पाया, सागर की गहराई,
मन में कितनी बात छिपी है कितनी इसकी गहराई,
प्यार की मूल कहाँ तक गहरी है जन पाया कोई,
खोदते खोदते पथिक थक जाता समझ न पाया कोई,
जो करते हैं प्यार सदा जीवन भर रोते-ढोते पछताते
हैं,
एक झलक प्रेयशी की पाने को,जीवन भर टकटकी लगते हैं।
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