मन का भार,
मेरे प्यार की आज अग्नि परिछा होगी,
हर कोई अपना शंका से भरा शब्द तीर चलाएगा,
मैं भी उसकी कुछ भी, न कर पाऊँगा मुसिकल आसान,
प्यार की परीछा सदैव अग्निपरिछा ही होती है,
मैं भी आज शिकारी की तरह तीरंदाजी का परिचय दूँगा,
मेरे प्यार पर जिसने भी आँख तरेरी होगी उसकी भी खैर नहीं,
समय बदलते देर नहीं लगती है, यह बात भी सच ही है,
कल हम भी अपना बदला उनसे लेगे जिनके कारण,
हम अलग-अलग रहने को मजबूर रहे, इस आसमान के नीचे,
सावन की गयी फुहारें, छूटी मौसम की रंगत,
बदली का यौवन निकाल गया,फूलों का सपत रंग गया,
हमने बिन भीगे ही, आँसू से बदन भिगोया सावन में,
उन अरमानो की जलन बुझाने को, हम भी नाचेगे संग-संग,
अब कोई भी नहीं करेगा रार, हम मिलकर चलेंगे संग-संग ।
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