धरती ने पीली साड़ी डाली है ,
रंग बिरंगी बूटे बेल चमकते,
जगह जगह पर धारी-धारी है,
हवा चल रही भीनी-भीनी सुगंध मदमाती,
फूलों की कतारें आड़ी तिरछी जैसे कोई फुलवारी,
गाँव का बरगद चिड़ियों का बसेरा है,
शाम सवेरे नौबत की सी किलकारी है,
पेड़ों पर बया के घोसले लटके,
कुछ कोनों पर घोसले औरों के रक्खे,
बच्चे कोयल पाले खुद घूमे मदमस्त,
सारे राजा जंगल के एक दूजे पर भारी है,
बंदर सबकी चाल समझने सबकी नोट करे कारगुजारी,
रात सियारो की होती है ऊपर मुंह कर के हैं कूके,
एक दहाड़ जो शेर निकाले सब चुपके-चुपके छिपते,
कोयल और पपीहा हर दम अपने राग मे डूबे,
मौसम सावन का क्यो न हरदम रहता एक समान,
सभी झूमते रहते करके सावन की ऋतु का गुण गान ।


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