Friday, October 26, 2012

बचपन के,


वो बचपन की यादें,
वो अपना अलहडपन,
वो दौड़कर पेड़ से लिपटना,
और इतने ज़ोर से दबाना,
जैसे कोई अपने प्रेमी से मिले,
और पूरी ताकत से पेड़ हिलना,
बोलना आज तो हिला के ही छोडूगा,
आज याद कर के लगता है क्या दिन थे बचपन के, 
वो तेजी के साथ दौड़ना,
हवा से बातें करना,
उछल उछल के चलना,
कभी गोल गोल धुमना,
आकाश की ओर देखना,
बादलों मे खो के मौन हो जाना,
हवा का झोंका लगना और फिर घूमना,
आज याद कर के लगता है क्या दिन थे बचपन के, 
हर समय सोंचते रहना,
बात कोई नहीं पर मौन रहना,
हर एक को अजनबी की तरह देखना,
मन मे कभी हसना कभी उदास होना,
बादल को देख के मन खुश होना,
बरशात मे धूम धूम के नाचना,
काले बादल पनि दे गुरधानी दे गाना,
आज याद कर के लगता है क्या दिन थे बचपन के, 
कोई लौटा दे वो मदहोशी के मेरे दिन थे जो बचपन के।

No comments:

Post a Comment