जिनने हमसे सीखा चलना और बहकना,
वो ही आज सिखाते है मुझे गिरके सभालना,
कभी मेरी उंगली पकड़ी थी उठने के लिए,
आज हाथ छुड़ाते है रूठ के जाने के लिए,
मौसम की तरह लोगों की हर बातें बदलती है,
प्यार में चार कदम चलते ही चाल बदलती है,
सावन की फुहारों में आगे निकालने को दौड़ते हैं,
फिसलते ही अपने भी पीछे मूड-मूड के हस्ते हैं,
कोई गिरे को उठाता नहीं आधी के आने पर,
उनने मुझे उठाया है बीच राह में गिर जाने पर ,
उनका ये उपकार हमारे ऊपर प्यार की खातिर है,
हम भी मिल के साथ-साथ चले है के खातिर है,

No comments:
Post a Comment