मैं जीवन की वीणा
बन जाऊँ तू बन जाये राग,
मैं तारों की झंकार बनू तू बन जाये मेरा राग,
झनकारों की परवाह किसे, तारों से जब
निकलेगा राग,
इतना भी झुकना ठीक नहीं,सर उठाना
मुशकिल हो जाय,
झूमता गगन मंडप,ऋतु बनी है
बराती,
सारी धरा फूलों सजी सेज,भौंरे हैं
बराती,
चिड़ियों ने बजाई शहनाई,चोंच गले का
है साज,
बगुला पानी में नाच नाच, संगीत ढ़ोल का
आज,
रंग बिरंगे फूल खिले हैं,खेत बन
गए चुनरी रंगीन,
डगरें बनी बेल बूटे जैसी ,पेंडों
से सजी बनी जमीन,
सावन की आई है बारात, हर मौसम बना
रहा बाराती,
बंदर,भालू, हाथी,शेर,चिड़ियाँ मोर को नाच
बताती,
बैल, गाय, बकरी, भेंडे,चारो ओर दौड़ करती खेल,
बालक ब्रद्ध नव युवक युवती खुशी में करते मेल,
भूख भी भारी लगती सबको,खाने की भी
रेल पेल,
सब बातों बातों में हजम,पूरी पुआ घी
हो या तेल,
चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियां आपस में है मेल,
फसल सजी दुल्हन जैसी मन में नहीं है कोई मैल,
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