Saturday, April 4, 2015

तशबीर मे सजाती है..............

टूटे हुये पत्ते भी  कभी  काम आते है,
जिंदगी को रोशनी नही देते,
मगर चमकते दमकते जरूर है,
कोई उनपर भी तहरीर लिखता है,

अपने गमों का सागर उड़ेल कर रंगता है,
एक सड़े गले अंगों की लकीरों के जालों को.  
दीवाल भी उसको तशबीर मे सजाती है,
कभी कोई उसकी भी बोली लगाकर खरीद लेता है,   

गिरे हुये पत्तों में भी चमक होती है ,
लोग उनपे भी अपनी कहानी सजाकर लिखते है,
सजाते है रंगों की कनातों से,
रखते सजाके दिल के पास में,

चाहत का एक भी कटरा लुढ़क न जाए गमों में,
जिंदगी बादल न जाये जमाने की बेरहम ठोकर में,
चलो हम भी कुछ सीख लेते हैं कुछ बेजुबानों से,

अपना भी करम बना लेते है एन महरबानों से।   

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